February 24

राजस्थान के 10 सबसे विशाल किले यहां देखें

हमने सुना है राजस्थान की धरती वीरता, शौर्य और राजपूती वैभव की गाथाओं से भरी पड़ी है, जहां विशाल किले इतिहास के गवाह बनकर खड़े हैं।

हालांकि हमने जब राजस्थान के विभिन्न किलों का भ्रमण किया तो पाया कि ये केवल सैन्य संरचनाएं नहीं थीं, बल्कि ये कला, संस्कृति, स्थापत्य और जल प्रबंधन के अद्भुत केंद्र भी थे, हालांकि आज इनमें से कई संरक्षण की मांग कर रहे हैं।

राजस्थान के किले अपने विशाल आकार, भव्य वास्तुकला और ऐतिहासिक घटनाओं के कारण विश्व प्रसिद्ध हैं, जिनमें से कई यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों में शामिल हैं।

किंतु इनकी वास्तविक महिमा को समझने के लिए इनका प्रत्यक्ष अनुभव आवश्यक है।

चित्तौड़गढ़ किला (भारत का सबसे विशाल दुर्ग)

विस्तार और स्थिति: चित्तौड़गढ़ किला न केवल राजस्थान बल्कि पूरे भारत का सबसे बड़ा किला माना जाता है, जो लगभग 700 एकड़ में फैला हुआ है। यह किला चित्तौड़गढ़ जिले में एक पहाड़ी पर स्थित है।

जिसकी ऊंचाई समुद्र तल से लगभग 180 मीटर है, हालांकि किले की दीवारों की लंबाई लगभग 13 किलोमीटर मानी जाती है। हमने देखा कि यह किला इतना विशाल है कि इसे पूरी तरह देखने में पूरा दिन लग जाता है।

जिसमें 84 जल संरचनाएं, 4 महल परिसर और अनगिनत मंदिर शामिल हैं, किंतु वर्तमान में कई संरचनाएं खंडहर अवस्था में हैं।

ऐतिहासिक महत्व: चित्तौड़गढ़ किले का इतिहास 7वीं शताब्दी से शुरू होता है, जब मौर्य राजाओं ने इसकी नींव रखी थी, हालांकि इसका वर्तमान स्वरूप मुख्यतः मेवाड़ के राजपूत शासकों द्वारा विकसित किया गया।

हमने सुना कि इस किले पर तीन प्रमुख घेराबंदी हुईं - 1303 ई. में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा, 1535 ई. में गुजरात के बहादुर शाह द्वारा और 1567 ई. में अकबर द्वारा।

जिनमें से प्रत्येक में हजारों राजपूत योद्धाओं ने जौहर और साका किया, जो राजपूत वीरता का प्रतीक बन गया। महाराणा कुम्भा, महाराणा सांगा और महाराणा प्रताप जैसे महान शासकों का संबंध इस किले से रहा है।

जो मेवाड़ के गौरवशाली इतिहास को दर्शाता है, किंतु 1568 में अकबर के आक्रमण के बाद मेवाड़ की राजधानी उदयपुर स्थानांतरित कर दी गई।

प्रमुख संरचनाएं: चित्तौड़गढ़ किले में विजय स्तंभ सबसे प्रसिद्ध संरचना है, जिसकी ऊंचाई 37 मीटर है और इसे महाराणा कुम्भा ने 1448 ई. में मालवा पर विजय के उपलक्ष्य में बनवाया था।

हमने जाना कि किले में कीर्ति स्तंभ, राणा कुम्भा महल, पद्मिनी महल, गौमुख कुंड और कलिका माता मंदिर जैसी महत्वपूर्ण संरचनाएं भी हैं, जो अलग-अलग कालखंडों में निर्मित हुईं।

हालांकि सभी राजपूत स्थापत्य कला के उत्कृष्ट नमूने हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा इस किले को संरक्षित स्मारक घोषित किया गया है।

और 2013 में इसे यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया, जो इसके वैश्विक महत्व को मान्यता देता है।

कुम्भलगढ़ किला (अजेय दीवारों का गढ़)

विशालता और निर्माण: कुम्भलगढ़ किला राजसमंद जिले में अरावली पहाड़ियों पर स्थित है, जिसकी दीवार की लंबाई लगभग 36 किलोमीटर मानी जाती है,

जो इसे चीन की महान दीवार के बाद दुनिया की दूसरी सबसे लंबी दीवार बनाती है। महाराणा कुम्भा ने 15वीं शताब्दी में इस किले का निर्माण करवाया था, जिसमें लगभग 15 वर्ष का समय लगा,

हालांकि कुछ इतिहासकार इसे पहले से मौजूद किले का विस्तार मानते हैं। हमने देखा कि किले की दीवार इतनी चौड़ी है कि इस पर आठ घोड़े एक साथ चल सकते हैं, जो इसकी सुरक्षा व्यवस्था की मजबूती को दर्शाता है,

किंतु इस विशाल निर्माण में कितने श्रमिकों ने कार्य किया इसका कोई सटीक रिकॉर्ड नहीं मिलता।

अजेय इतिहास: कुम्भलगढ़ किले को 'अजेय दुर्ग' कहा जाता है क्योंकि इतिहास में केवल एक बार 1578 ई. में इसे जीता जा सका था, जब अकबर, मानसिंह और शाहबाज खान की संयुक्त सेनाओं ने घेराबंदी की थी।

हमने सुना कि महाराणा प्रताप का जन्म इसी किले में 1540 ई. में हुआ था और यह किला मेवाड़ के राजघराने के लिए शरणस्थली का काम करता था, जब भी चित्तौड़ पर संकट आता था,

हालांकि 1615 में यह किला मुगलों के नियंत्रण में आ गया। राजस्थान के इतिहासकार गौरीशंकर हीराचंद ओझा के अनुसार,

इस किले ने मेवाड़ की स्वतंत्रता बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो राजपूत प्रतिरोध का प्रतीक बना।

वास्तुकला और दर्शनीय स्थल: कुम्भलगढ़ किले में 360 से अधिक मंदिर हैं, जिनमें से 300 जैन मंदिर और 60 हिंदू मंदिर हैं, जो धार्मिक सहिष्णुता को दर्शाते हैं।

हमने जाना कि किले में बादल महल, कुम्भा महल और नीलकंठ महादेव मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं, जहां की नक्काशी और भित्ति चित्र 15वीं-16वीं शताब्दी की कला का प्रतिनिधित्व करते हैं,

किंतु कई संरचनाएं जीर्णोद्धार की प्रतीक्षा में हैं। यह किला भी 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया, जो इसकी वैश्विक महत्ता को स्वीकार करता है,

हालांकि स्थानीय पर्यटन को और विकसित करने की आवश्यकता है।

रणथंभौर किला (जंगल में छिपा सामरिक गढ़)

स्थान और भौगोलिक महत्व: रणथंभौर किला सवाई माधोपुर जिले में रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के बीच एक पहाड़ी पर स्थित है, जो लगभग 700 फीट की ऊंचाई पर बना हुआ है।

हमने सुना इस किले का निर्माण चौहान राजाओं ने 8वीं शताब्दी में करवाया था, हालांकि इसका वर्तमान स्वरूप 12वीं-13वीं शताब्दी में विकसित हुआ, जब यह दिल्ली और गुजरात के बीच एक महत्वपूर्ण सामरिक बिंदु था।

हमने देखा कि किला चारों ओर से घने जंगलों से घिरा हुआ है, जो प्राकृतिक सुरक्षा प्रदान करता था, किंतु वर्तमान में यही जंगल बाघों का आवास है, जो पर्यटकों के लिए अतिरिक्त आकर्षण बनता है।

ऐतिहासिक संघर्ष: रणथंभौर किले का सबसे प्रसिद्ध संघर्ष 1301 ई. में अलाउद्दीन खिलजी और चौहान शासक हम्मीरदेव के बीच हुआ था, जिसमें हम्मीरदेव ने अपार वीरता दिखाई।

हमने सुना कि इस युद्ध में हजारों राजपूत योद्धाओं ने प्राण न्यौछावर कर दिए और रानियों ने जौहर किया, जो राजपूत शौर्य का प्रतीक बन गया, हालांकि अंततः किला खिलजी के अधीन आ गया।

इतिहासकार अमीर खुसरो ने अपनी पुस्तक 'खजाइन-उल-फुतुह' में इस घेराबंदी का विस्तृत वर्णन किया है, जो इस घटना की भयावहता को दर्शाता है,

किंतु बाद में यह किला मुगलों और फिर जयपुर के कछवाहा राजाओं के नियंत्रण में आ गया।

धार्मिक महत्व: रणथंभौर किले में त्रिनेत्र गणेश मंदिर स्थित है, जो पूरे भारत में प्रसिद्ध है क्योंकि यहां भक्त पत्र लिखकर गणेश जी को निवेदन भेजते हैं। हमने जाना कि इस मंदिर की स्थापना 1299 ई. में हुई थी।

और आज भी हजारों श्रद्धालु यहां पूजा के लिए आते हैं, विशेष रूप से गणेश चतुर्थी के अवसर पर, जब विशाल मेला लगता है। किले में जैन मंदिर भी हैं, जो 12वीं-13वीं शताब्दी के हैं,

हालांकि उनकी स्थिति संरक्षण की मांग करती है, किंतु 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने से इन्हें अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिली है।

मेहरानगढ़ किला (मारवाड़ का अभेद्य किला)

स्थापना और विस्तार: मेहरानगढ़ का किला जोधपुर शहर के बीचोंबीच एक 125 मीटर ऊंची पहाड़ी पर स्थित है, जिसे राव जोधा ने 1459 ई. में बनवाया था। यह किला लगभग 5 किलोमीटर के क्षेत्र में फैला हुआ है।

और इसकी दीवारों की ऊंचाई 36 मीटर तक है, जो इसे राजस्थान के सबसे सुरक्षित किलों में से एक बनाती है, हालांकि इसके निर्माण में कई चरणों में विस्तार हुआ। हमने देखा कि किले के सात विशाल द्वार हैं,

जिनमें जयपोल और फतेहपोल प्रमुख हैं, जो विभिन्न युद्धों में विजय के प्रतीक हैं, किंतु इन दरवाजों पर तोप के गोलों के निशान आज भी देखे जा सकते हैं।

वास्तुकला का चमत्कार: मेहरानगढ़ किले की वास्तुकला राजपूत और मुगल शैली का अद्भुत मिश्रण है, जहां मोती महल, फूल महल, शीश महल और चामुंडा देवी मंदिर प्रमुख आकर्षण हैं।

हमने सुना कि फूल महल राजस्थान का सबसे भव्य कक्ष माना जाता है, जिसे महाराजा अभय सिंह ने 1730 के दशक में बनवाया था, जहां सोने की परत चढ़ी छत और दीवारों पर बारीक चित्रकारी देखने को मिलती है।

किले का संग्रहालय राजस्थान के सबसे समृद्ध संग्रहालयों में से एक है, जिसमें हथियार, वेशभूषा, पालकी, चित्र और राजसी सामान संरक्षित हैं,

हालांकि इसकी स्थापना 1972 में महाराजा गज सिंह द्वितीय ने की थी, जो आज भी राठौड़ परिवार द्वारा प्रबंधित है।

पर्यटन महत्व: मेहरानगढ़ किला राजस्थान के सबसे अधिक देखे जाने वाले पर्यटन स्थलों में से एक है, जहां प्रतिवर्ष लाखों घरेलू और विदेशी पर्यटक आते हैं। हमको लगा कि किले से जोधपुर शहर का विहंगम दृश्य अत्यंत मनोरम है,

जिसमें नीले रंग के मकान इसे 'ब्लू सिटी' का नाम देते हैं, किंतु शाम के समय किले की रोशनी विशेष रूप से आकर्षक होती है। राजस्थान पर्यटन विभाग के आंकड़ों के अनुसार,

मेहरानगढ़ किला राज्य के शीर्ष पांच पर्यटन स्थलों में शामिल है, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था में महत्वपूर्ण योगदान देता है।

जैसलमेर किला (रेगिस्तान का सोनार गढ़)

स्थापना और अनोखापन: जैसलमेर का किला राजस्थान का एकमात्र 'जीवित किला' है, जहां आज भी लगभग 3000 लोग रहते हैं, जो इसे विश्व में अद्वितीय बनाता है।

राजपूत शासक रावल जैसल ने 1156 ई. में त्रिकुट पहाड़ी पर इस किले की स्थापना की थी, जो समुद्र तल से लगभग 250 फीट की ऊंचाई पर बना है, हालांकि इसका विस्तार उनके उत्तराधिकारियों ने किया।

हमने देखा कि किला पीले बलुआ पत्थर से बना है, जो सूर्य की रोशनी में सोने की तरह चमकता है, इसलिए इसे 'सोनार गढ़' या 'स्वर्ण नगरी' भी कहा जाता है, किंतु रेगिस्तानी वातावरण के कारण इसके संरक्षण में विशेष चुनौतियां हैं।

व्यापारिक महत्व: जैसलमेर किला मध्यकाल में रेशम मार्ग पर एक महत्वपूर्ण व्यापारिक केंद्र था, जहां से भारत, मध्य एशिया और यूरोप के बीच व्यापार होता था। हमने सुना कि किले के व्यापारियों ने अपार धन संचय किया।

और भव्य हवेलियां बनवाईं, जिनमें पटवों की हवेली, सलीम सिंह की हवेली और नथमल की हवेली प्रसिद्ध हैं, जो आज भी पर्यटकों को आकर्षित करती हैं। भारतीय इतिहास के प्रसिद्ध विद्वान सतीश चंद्र के अनुसार,

जैसलमेर का व्यापारिक महत्व 12वीं से 18वीं शताब्दी तक अपने चरम पर था, जब यह मार्ग अत्यंत समृद्ध था, किंतु 19वीं शताब्दी में समुद्री व्यापार के विकास से इसका महत्व कम हो गया।

संरक्षण की चुनौतियां: जैसलमेर किले को 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया, लेकिन साथ ही इसे 'संकटग्रस्त धरोहर' की सूची में भी रखा गया है।

हमने जाना कि किले की नींव में रेत होने और आधुनिक जल निकासी प्रणाली की कमी के कारण इसकी संरचना कमजोर हो रही है, जो गंभीर चिंता का विषय है,

हालांकि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण और अंतरराष्ट्रीय संगठन इसके संरक्षण में लगे हुए हैं। वर्ल्ड मॉन्यूमेंट्स फंड ने इस किले को 'विश्व के संकटग्रस्त स्मारकों' की सूची में शामिल किया है, जिससे अंतरराष्ट्रीय सहायता मिल रही है।

आमेर किला (जयपुर का राजसी महल)

स्थापना और विकास: आमेर का किला जयपुर से लगभग 11 किलोमीटर दूर एक पहाड़ी पर स्थित है, जिसे राजा मान सिंह प्रथम ने 1592 ई. में बनवाना शुरू किया था।

यह किला और महल परिसर राजपूत और मुगल वास्तुकला का सुंदर संगम है, जो लगभग 4 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ है, हालांकि इसका निर्माण कई चरणों में पूरा हुआ।

हमने देखा कि किले तक पहुंचने के लिए हाथी की सवारी उपलब्ध है, जो पर्यटकों के बीच बेहद लोकप्रिय है, किंतु पशु कल्याण को लेकर कुछ विवाद भी उठते रहे हैं, जिसके बाद नियमों में सुधार किया गया है।

प्रमुख आकर्षण: आमेर किले में शीश महल सबसे प्रसिद्ध संरचना है, जिसकी दीवारों और छत पर लाखों दर्पण जड़े हुए हैं, जो मोमबत्ती की एक टिमटिमाहट से पूरे कक्ष को रोशन कर देते हैं।

हमने सुना कि दीवान-ए-आम, दीवान-ए-खास, सुख निवास और गणेश पोल इस किले के अन्य महत्वपूर्ण हिस्से हैं, जहां की वास्तुकला और कलाकृतियां 16वीं-17वीं शताब्दी की उत्कृष्टता को दर्शाती हैं।

किले के भीतर एक कृत्रिम झील भी है, जिसे माओता झील कहा जाता है, जो किले को ठंडा रखने और जल आपूर्ति के लिए बनाई गई थी, हालांकि अब इसमें प्रदूषण की समस्या है, किंतु यह किले के परिदृश्य को सुंदरता प्रदान करती है।

यूनेस्को मान्यता: आमेर किला 2013 में राजस्थान के पहाड़ी किलों के समूह के रूप में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल किया गया, जो इसके वैश्विक महत्व को स्वीकार करता है।

हमको लगा कि किले में हर शाम होने वाला लाइट एंड साउंड शो अत्यंत प्रभावशाली है, जो आमेर के इतिहास को जीवंत रूप में प्रस्तुत करता है, हालांकि यह शो केवल हिंदी और अंग्रेजी में उपलब्ध है।

राजस्थान पर्यटन के आंकड़ों के अनुसार, आमेर किला जयपुर का सबसे अधिक देखा जाने वाला स्मारक है, जहां वार्षिक लाखों पर्यटक आते हैं।

जूनागढ़ किला (बीकानेर का अद्वितीय किला)

विशिष्टता: जूनागढ़ किला राजस्थान का एकमात्र प्रमुख किला है जो पहाड़ी पर नहीं बल्कि मैदानी क्षेत्र में बना है, जो इसे अन्य किलों से अलग बनाता है। राजा राय सिंह ने 1589 ई. में इस किले का निर्माण करवाया था।

जो लगभग 5.28 हेक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है, हालांकि इसकी सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत मजबूत थी। हमने देखा कि किले की दीवारें 14.5 फीट चौड़ी हैं और इसके चारों ओर 986 मीटर लंबी खाई थी।

जो शत्रुओं के लिए चुनौती बनती थी, किंतु आज यह खाई भर गई है।

स्थापत्य वैभव: जूनागढ़ किले में 37 महल, मंदिर और मंडप हैं, जो राजपूत, मुगल और गुजराती स्थापत्य शैली का मिश्रण प्रस्तुत करते हैं। हमने जाना कि अनूप महल, चंद्र महल, फूल महल और बादल महल।

इस किले के प्रमुख आकर्षण हैं, जहां सोने की पत्तियों, दर्पणों और चित्रकारी का भव्य कार्य देखा जा सकता है। किले का संग्रहालय बेहद समृद्ध है।

जिसमें संस्कृत और फारसी की दुर्लभ पांडुलिपियां, लघु चित्र, हथियार और शाही वस्त्र संरक्षित हैं, हालांकि इसकी स्थापना 1961 में महाराजा डॉ. कर्णी सिंह ने की थी, जो आज भी राज परिवार द्वारा प्रबंधित है।

नाहरगढ़ किला (जयपुर की रक्षक पहाड़ी)

रणनीतिक स्थिति: नाहरगढ़ किला जयपुर शहर के उत्तर में अरावली पहाड़ियों पर स्थित है, जो शहर की सुरक्षा के लिए बनाया गया था। महाराजा सवाई जय सिंह द्वितीय ने 1734 ई. में इस किले का निर्माण शुरू करवाया था,

जिसे बाद में महाराजा सवाई माधो सिंह ने 1868 में विस्तारित किया, हालांकि इस किले पर कभी आक्रमण नहीं हुआ। हमने सुना कि नाहरगढ़ का अर्थ 'बाघों का निवास' है,

लेकिन कुछ मान्यताओं के अनुसार यह नाम नाहर सिंह भोमिया नामक राजकुमार की आत्मा को शांत करने के लिए रखा गया था, जो निर्माण में बाधा डाल रहे थे।

माधवेंद्र भवन: नाहरगढ़ किले में माधवेंद्र भवन सबसे दिलचस्प संरचना है, जिसे महाराजा सवाई माधो सिंह ने अपनी नौ रानियों के लिए बनवाया था। हमने देखा कि यह भवन नौ समान अपार्टमेंट में विभाजित है,

जो एक केंद्रीय गलियारे से जुड़े हुए हैं, जहां प्रत्येक रानी के लिए अलग सुविधाएं थीं, किंतु सभी समान थीं ताकि कोई भेदभाव न हो। किले से जयपुर शहर का पूर्ण दृश्य दिखाई देता है, जो विशेष रूप से शाम के समय बेहद सुंदर होता है,

हालांकि यह स्थान युवाओं और फिल्म निर्माताओं के बीच भी लोकप्रिय है।

गागरोन किला (जल दुर्ग का अनोखा उदाहरण)

अनूठी स्थिति: गागरोन किला राजस्थान के झालावाड़ जिले में स्थित है, जो भारत के उन चुनिंदा किलों में से एक है जो तीन ओर से पानी से घिरा हुआ है। कालीसिंध और आहु नदियों के संगम पर स्थित।

यह किला 'जल दुर्ग' की श्रेणी में आता है, जिसका निर्माण 7वीं शताब्दी में डोड राजपूतों द्वारा किया गया था, हालांकि बाद में खींची राजपूतों ने इसे विकसित किया। हमने देखा कि चौथी ओर एक गहरी खाई बनाई गई थी।

जो पूर्ण सुरक्षा प्रदान करती थी, किंतु आज यह खाई सूख गई है।

ऐतिहासिक घटनाएं: गागरोन किले पर 14 बार आक्रमण हुए, जिनमें दो बार जौहर और साका हुआ, जो राजपूत वीरता का प्रमाण है। हमने सुना कि 1423 ई. में मालवा के सुल्तान होशंग शाह ने इस किले पर आक्रमण किया।

और राजा पाल सिंह खींची की हार के बाद रानियों ने जौहर किया, जो इतिहास में दर्ज है। सूफी संत हमीदुद्दीन चिश्ती की दरगाह इस किले में स्थित है।

जहां हर वर्ष मुहर्रम के अवसर पर बड़ा मेला लगता है, हालांकि यह स्थान हिंदू-मुस्लिम सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतीक है, किंतु 2013 में यूनेस्को विश्व धरोहर सूची में शामिल होने के बावजूद यह किला अपेक्षाकृत कम ज्ञात है।

तारागढ़ किला (अजमेर की पहरेदार चोटी)

ऐतिहासिक महत्व: तारागढ़ किला अजमेर शहर में एक पहाड़ी पर स्थित है, जिसे 'राजस्थान का जिब्राल्टर' भी कहा जाता है क्योंकि यह लगभग अजेय माना जाता था।

चौहान राजा अजयराज ने 1113 ई. में इस किले का निर्माण करवाया था, जो भारत के सबसे पुराने पहाड़ी किलों में से एक है, हालांकि बाद में मुगल और ब्रिटिश शासकों ने इसमें संशोधन किए।

हमने जाना कि इस किले ने दिल्ली और गुजरात के बीच संबंध मार्ग पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जो इसे सामरिक रूप से अत्यंत महत्वपूर्ण बनाता था, किंतु वर्तमान में यह किला उपेक्षा का शिकार है।

और संरक्षण की तत्काल आवश्यकता है।

राजस्थान के ये दस विशाल किले न केवल वास्तुकला के उत्कृष्ट नमूने हैं, बल्कि ये राजपूत वीरता, बलिदान और सांस्कृतिक समृद्धि के जीवंत प्रमाण भी हैं, जो भारतीय इतिहास की अमूल्य धरोहर हैं।