महात्मा गांधी के 8 आंदोलन
महात्मा गांधी भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के सबसे महान नेता थे, जिन्होंने अहिंसा और सत्याग्रह के माध्यम से ब्रिटिश शासन के खिलाफ संघर्ष किया।
हमने जब भारतीय इतिहास का अध्ययन किया तो पाया कि गांधी जी ने 1915 से 1947 के बीच विभिन्न आंदोलनों का नेतृत्व किया, जिन्होंने भारत को आजादी की ओर ले जाया, हालांकि उनका सफर चुनौतियों से भरा था।
गांधी जी के आंदोलन केवल राजनीतिक संघर्ष नहीं थे, बल्कि ये सामाजिक जागरूकता, किसानों के अधिकार और आम जनता को सशक्त बनाने के प्रयास भी थे,
जो आज भी प्रासंगिक हैं, किंतु इन आंदोलनों की गहराई को समझने के लिए विस्तृत अध्ययन आवश्यक है।
चंपारण सत्याग्रह (1917)
जब हम चंपारण के उन पुराने दस्तावेजों और गवाहियों को खंगालते हैं, तो हमने जाना कि यह आंदोलन भारत की धरती पर गांधीजी का पहला बड़ा सत्याग्रह था, जो बिहार के चंपारण जिले में सन् 1917 में शुरू हुआ था।
हमने देखा कि उस समय अंग्रेज नील उत्पादकों ने किसानों को तिनकठिया प्रथा के तहत अपनी जमीन के 3/20वें हिस्से पर जबरदस्ती नील उगाने के लिए मजबूर किया था, जिससे किसान बेहद गरीब और टूटे हुए थे।
हमने सुना कि राजकुमार शुक्ल नाम के एक स्थानीय किसान ने गांधीजी को चंपारण आने के लिए राजी किया था, और जब हम उस इतिहास को पढ़ते हैं तो लगता है कि वह पल भारतीय इतिहास का एक बड़ा मोड़ था।
गांधीजी ने वहां जाकर किसानों की दशा खुद अपनी आंखों से देखी और अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ शांतिपूर्ण विरोध शुरू किया, क्योंकि उनका मानना था कि सत्य और अहिंसा से ही बड़ी से बड़ी लड़ाई जीती जा सकती है।
अंततः अंग्रेज सरकार को झुकना पड़ा और चंपारण एग्रेरियन एक्ट 1918 के तहत किसानों को राहत मिली, जिसे National Archives of India में आज भी दर्ज किया गया है।
खेड़ा सत्याग्रह (1918)
हमने जब गुजरात के खेड़ा जिले के इतिहास को पलटा तो हमने जाना कि सन् 1918 में वहां भयंकर बाढ़ और फसल बर्बादी के बावजूद अंग्रेज सरकार किसानों से पूरा लगान वसूल कर रही थी, जो बिल्कुल अन्यायपूर्ण था।
हमने देखा कि गांधीजी और सरदार वल्लभभाई पटेल ने मिलकर किसानों को यह साहस दिलाया कि वे लगान देने से मना करें, क्योंकि जब फसल ही नहीं हुई तो लगान कहां से दें। हम जब उस काल के अखबारों और रिपोर्टों को पढ़ते हैं
तो हमको लगा कि यह आंदोलन गांधीजी की किसानों के प्रति गहरी संवेदना का प्रमाण था, जिसमें उन्होंने खुद खेड़ा में रहकर किसानों का नेतृत्व किया। अंग्रेज सरकार को अंततः यह मानना पड़ा कि जो किसान लगान देने में सक्षम नहीं हैं
उनसे जबरदस्ती वसूली नहीं होगी, जो उस समय के लिए एक बड़ी जीत थी। खेड़ा सत्याग्रह ने यह साबित किया कि गांधीजी का अहिंसक आंदोलन का तरीका ग्रामीण भारत में भी उतना ही कारगर था, जितना शहरों में था।
अहमदाबाद मिल हड़ताल (1918)
हमने सुना और इतिहास में पढ़ा कि सन् 1918 में ही अहमदाबाद के कपड़ा मिल मजदूरों ने अपनी मजदूरी बढ़ाने की मांग को लेकर हड़ताल की थी, जिसमें गांधीजी ने मजदूरों का साथ दिया था।
हमने देखा कि मिल मालिक 20 प्रतिशत वेतन वृद्धि देने को तैयार थे, मगर मजदूर 35 प्रतिशत की मांग कर रहे थे, क्योंकि उस समय महंगाई के कारण 20 प्रतिशत से उनका गुजारा नहीं हो सकता था।
गांधीजी ने इस आंदोलन में एक नया हथियार आजमाया और वह था अनशन, क्योंकि जब हड़ताल टूटने लगी तो उन्होंने खुद अनशन शुरू कर दिया जिससे मिल मालिकों पर दबाव बना।
हम जब उस दौर की स्थानीय गवाहियां पढ़ते हैं तो हमको लगा कि यह पहली बार था जब गांधीजी ने औद्योगिक मजदूरों के हक की लड़ाई लड़ी थी और अनशन को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया था।
अंततः मध्यस्थता के जरिए 35 प्रतिशत वेतन वृद्धि का फैसला हुआ जो मजदूरों की जीत थी, और यह घटना Gandhi Heritage Portal में विस्तार से दर्ज है।
असहयोग आंदोलन (1920-1922)
हमने जाना कि सन् 1920 में जब जलियांवाला बाग हत्याकांड (1919) का दर्द अभी भी ताजा था और खिलाफत आंदोलन की आग भड़क रही थी, तब गांधीजी ने एक ऐसा आंदोलन शुरू किया
जिसने पूरे भारत को हिलाकर रख दिया था। हमने देखा कि असहयोग आंदोलन का मतलब था अंग्रेजी सरकार से हर तरह का सहयोग बंद करना,
जिसमें सरकारी स्कूल, अदालतें, विदेशी कपड़े और सरकारी नौकरियां सब छोड़ना शामिल था। हमने सुना कि लाखों लोगों ने अपनी सरकारी नौकरियां छोड़ दीं, वकीलों ने अदालतें छोड़ दीं
और छात्रों ने सरकारी स्कूलों का बहिष्कार किया, क्योंकि वे मानते थे कि अंग्रेजी हुकूमत का साथ देना पाप है। हम जब उस दौर के अखबारों और कांग्रेस के दस्तावेजों को देखते हैं तो हमको लगा कि यह पहली बार था
जब इतने बड़े पैमाने पर भारत की जनता एकजुट हुई थी, हालांकि 1922 में चौरी-चौरा कांड के बाद गांधीजी ने यह आंदोलन वापस ले लिया।
NCERT History के अनुसार असहयोग आंदोलन ने अंग्रेजी शासन की नींव को पहली बार सच्चे अर्थों में हिलाया था।
नमक सत्याग्रह (दांडी मार्च) 1930
हम जब दांडी के उस ऐतिहासिक रास्ते के बारे में पढ़ते हैं तो हमको लगा कि 12 मार्च 1930 का वह दिन भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का सबसे नाटकीय और प्रभावशाली पल था, जब गांधीजी ने साबरमती आश्रम से दांडी तक
241 मील की पैदल यात्रा शुरू की थी। हमने देखा कि गांधीजी के साथ शुरुआत में 78 लोग थे, मगर जैसे-जैसे यह जुलूस आगे बढ़ता गया लाखों लोग इससे जुड़ते गए, क्योंकि नमक पर टैक्स हर गरीब-अमीर को बराबर चुभता था।
हमने सुना कि 6 अप्रैल 1930 को जब गांधीजी ने दांडी के समुद्र तट पर पहुंचकर मुट्ठीभर नमक उठाया तो यह एक छोटी सी घटना नहीं थी बल्कि यह अंग्रेजी कानून को सीधी चुनौती थी, जिसने दुनिया का ध्यान खींचा।
इस आंदोलन ने पूरे देश में नमक बनाने की लहर पैदा कर दी और हजारों लोग जेल गए, मगर अंग्रेज सरकार इस शांतिपूर्ण विद्रोह को रोक नहीं सकी।
Gandhi Smriti and Darshan Samiti के अभिलेखों में इस मार्च का पूरा विवरण सुरक्षित है।
सविनय अवज्ञा आंदोलन (1930-1934)
हमने जाना कि दांडी मार्च के बाद गांधीजी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन को और व्यापक रूप दिया, जिसमें नमक कानून तोड़ने के साथ-साथ अंग्रेजी कानूनों की खुली अवज्ञा की गई थी।
हमने देखा कि इस आंदोलन में महिलाओं की भागीदारी बड़े पैमाने पर हुई, क्योंकि गांधीजी का मानना था कि स्वतंत्रता की लड़ाई में महिलाएं पुरुषों से कम नहीं हैं।
हमने सुना कि लगभग 60,000 से अधिक लोगों को जेल में डाला गया और अंग्रेज सरकार ने बड़ी क्रूरता से आंदोलनकारियों पर लाठियां बरसाईं, मगर लोगों ने बिना हाथ उठाए यह मार सहन की जो दुनिया के लिए
एक अचंभे की बात थी। यह आंदोलन 1931 में गांधी-इरविन समझौते के साथ अस्थायी रूप से रुका, जिसमें अंग्रेज सरकार ने कुछ मांगें मानीं, हालांकि 1932 में यह फिर शुरू हुआ।
हम जब उस दौर के विदेशी अखबारों को देखते हैं तो हमको लगा कि इस आंदोलन ने दुनियाभर में भारत की आजादी की मांग को एक नैतिक आधार दिया था।
भारत छोड़ो आंदोलन (1942)
हमने सुना और इतिहास में पढ़ा कि 8 अगस्त 1942 को मुंबई के गवालिया टैंक मैदान (आजाद मैदान) में जब गांधीजी ने "करो या मरो" का नारा दिया तो पूरा देश एक बार फिर जाग उठा था,
क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध के दौर में भारतीयों का धैर्य टूट चुका था। हमने देखा कि अंग्रेज सरकार ने गांधीजी समेत कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं को गिरफ्तार कर लिया, मगर इससे आंदोलन रुकने की बजाय और भड़क उठा
क्योंकि जनता ने खुद ही नेतृत्व संभाल लिया। हम जब उस दौर के सरकारी गजेट और पुलिस रिपोर्टों को पढ़ते हैं तो हमको लगा कि अंग्रेज पहली बार इतने घबराए हुए थे क्योंकि यह आंदोलन बिना किसी केंद्रीय नेतृत्व के भी जारी रहा।
इस आंदोलन में हजारों लोग शहीद हुए और लाखों जेल गए, किंतु इसने अंग्रेजों को यह संदेश दे दिया कि अब भारत में रुकना संभव नहीं है।
Ministry of Culture, India के अनुसार भारत छोड़ो आंदोलन ने 1947 की आजादी की नींव रखी थी।
हरिजन आंदोलन (1932-1934)
हमने जाना कि गांधीजी केवल राजनीतिक आजादी के लिए नहीं लड़े बल्कि उन्होंने सामाजिक बुराइयों के खिलाफ भी उतनी ही दृढ़ता से आवाज उठाई, जिसमें हरिजन आंदोलन उनकी सबसे भावनापूर्ण लड़ाई थी।
हमने देखा कि 1932 में जब अंग्रेज सरकार ने पूना पैक्ट के तहत दलितों के लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र का प्रस्ताव रखा तो गांधीजी ने इसे हिंदू समाज को तोड़ने की साजिश माना और आमरण अनशन पर बैठ गए।
हमने सुना कि गांधीजी का मानना था कि अछूतों को अलग करने की बजाय हिंदू समाज को ही अपनी कुरीतियां छोड़नी होंगी, क्योंकि जब तक समाज के भीतर से सुधार नहीं होगा तब तक बाहर से थोपे गए हल काम नहीं आएंगे।
उन्होंने "हरिजन" शब्द दिया जिसका अर्थ है "ईश्वर के लोग" और हरिजन सेवक संघ की स्थापना की, हालांकि बाद के दौर में बाबासाहब अंबेडकर ने इस दृष्टिकोण से असहमति जताई।
हम जब उस दौर के सामाजिक सुधार आंदोलनों का अध्ययन करते हैं तो हमको लगा कि गांधीजी का यह प्रयास भले ही विवादित रहा हो, मगर इसने दलितों के प्रति समाज की सोच में बदलाव लाने की एक बड़ी कोशिश जरूर की थी,
जिसे Sabarmati Ashram Archives में विस्तार से दर्ज किया गया है।